उत्तराखंड क्रांति दल • उत्तराखंड क्रांति दल के नेता और संस्थापक सदस्य
लिंग : Male
जन्म तिथि : 01 Jun 1953
जन्म स्थान : पिथौरागढ़ के धारचूला के पंथागांव
क्षेत्र : पिथौरागढ़
सक्रिय वर्ष : 2027
स्थिति : Active
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काशी सिंह ऐरी (जन्म: 1 जून 1953) उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति का एक प्रमुख नाम हैं। वे Uttarakhand Kranti Dal (यूकेडी) के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड विधानसभा के पूर्व सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने 25 जुलाई 1979 को मसूरी में बिपिन चंद्र त्रिपाठी, डी.डी. पंत और इंद्रमणि बडोनी के साथ मिलकर उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना की। अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक स्वर देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
काशी सिंह ऐरी का जन्म 1 जून 1953 को पिथौरागढ़ जनपद के धारचूला क्षेत्र के पंथागांव में हुआ। उनके पिता का नाम केहर सिंह और माता का नाम सुनीता देवी था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बलुवाकोट में हुई। उन्होंने जीआईसी नारायण नगर, डीडीहाट से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण किया।
उच्च शिक्षा के लिए वे पिथौरागढ़ गए, जहाँ से उन्होंने स्नातक की पढ़ाई की और छात्र राजनीति में सक्रिय हुए। वर्ष 1973 में वे जीपीजीसी पिथौरागढ़ छात्र संघ के उपाध्यक्ष चुने गए। इसके बाद वे नैनीताल गए और Kumaun University से एमएससी (वनस्पति विज्ञान) और एमए (सामाजिक विज्ञान) में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। सामाजिक विज्ञान में उन्हें स्वर्ण पदक भी मिला। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने लखनऊ से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की।
उनकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ यह दर्शाती हैं कि वे केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि एक मेधावी और बौद्धिक व्यक्तित्व भी रहे हैं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान काशी सिंह ऐरी अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता रहे। 25 जुलाई 1979 को मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना कर उन्होंने पहाड़ की क्षेत्रीय राजनीति को नई दिशा दी।
उन्होंने डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधानसभा में तीन बार विधायक के रूप में (1985–1989, 1989–1991, 1993–1996) प्रतिनिधित्व किया। 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद वे प्रथम उत्तराखंड विधानसभा (2002–2007) के सदस्य भी रहे।
एक समय ऐसा था जब उत्तराखंड की राजनीति में उनका नाम सबसे अधिक चर्चित था। अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते हुए वे मात्र लगभग 9000 वोटों से हार गए थे। उस चुनाव में बड़े राष्ट्रीय नेताओं की तुलना में भी उनका जनाधार उल्लेखनीय रहा।
37 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में 2022 पहली बार ऐसा वर्ष था जब काशी सिंह ऐरी चुनावी मैदान में दिखाई नहीं दिए। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियाँ उनके जैसे सिद्धांतवादी नेताओं के लिए अनुकूल नहीं रहीं।
उनका कहना है कि अब चुनावों में धनबल का प्रभाव बढ़ गया है, जबकि उन्होंने हमेशा संघर्ष और जनसंपर्क की राजनीति को प्राथमिकता दी। वे मानते हैं कि बदलते राजनीतिक मूल्यों के कारण वे स्वयं को वर्तमान चुनावी ढांचे में उपयुक्त नहीं पाते। इस निर्णय के माध्यम से उन्होंने राजनीति में नैतिकता और मूल्यों पर एक गंभीर बहस भी छेड़ी है।
काशी सिंह ऐरी को एक सादगीपूर्ण, सिद्धांतवादी और संघर्षशील नेता के रूप में जाना जाता है। उत्तराखंड राज्य आंदोलन और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।
एक समय था जब उत्तराखंड के बाहर पहाड़ की राजनीति का पर्याय उनका नाम बन गया था। आज भले ही वे सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर हों, लेकिन उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीतिक चेतना में उनका स्थान विशेष बना हुआ है।
काशी सिंह ऐरी की राजनीतिक दृष्टि उत्तराखंड की क्षेत्रीय अस्मिता, स्वाभिमान और आत्मनिर्भर विकास पर आधारित रही है। उनका मानना रहा है कि पहाड़ का विकास पहाड़ की सोच से ही संभव है।
उनकी दृष्टि के प्रमुख बिंदु इस प्रकार रहे —
स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय अधिकार
जल, जंगल और जमीन पर पहाड़ के लोगों का पहला अधिकार हो। बाहरी शोषण की बजाय स्थानीय युवाओं को रोजगार और अवसर मिलें।
पलायन मुक्त उत्तराखंड
पहाड़ से हो रहे लगातार पलायन को रोकना उनकी प्राथमिक चिंता रही। वे चाहते थे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार की सुविधाएँ गाँवों तक पहुँचें ताकि लोग अपना घर-गाँव न छोड़ें।
स्वच्छ और मूल्य आधारित राजनीति
ऐरी हमेशा सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों की राजनीति के पक्षधर रहे। उनका मानना है कि राजनीति सेवा का माध्यम होनी चाहिए, न कि धनबल और स्वार्थ का साधन।
संतुलित क्षेत्रीय विकास
कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में समान रूप से विकास हो, ताकि क्षेत्रीय असंतुलन न बढ़े।
युवा शक्ति और शिक्षा
शिक्षित युवाओं को नेतृत्व और अवसर देना, तथा पहाड़ में उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों की स्थापना को बढ़ावा देना।