प्रो. डी. डी. पंत, जिनका पूरा नाम देवी दत्त पंत था, भारत के प्रख्यात भौतिक विज्ञानी, शिक्षाविद और उत्तराखंड के बौद्धिक आंदोलन के अग्रदूतों में से एक थे। वे नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक C. V. Raman के मेधावी शिष्य रहे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फोटोफिजिक्स तथा स्पेक्ट्रोस्कोपी के क्षेत्र में अपने शोध के लिए प्रसिद्ध हुए। वे कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति रहे और उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद आधुनिक फोटो फिजिक्स प्रयोगशाला की स्थापना कर असाधारण उदाहरण प्रस्तुत किया।
उनका जन्म 14 अगस्त 1919 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट ब्लॉक के दूरस्थ गांव देवराड़ी में वैद्य अंबा दत्त पंत के घर हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त की। उनकी प्रतिभा बचपन से ही स्पष्ट थी, जिसके कारण उनके पिता ने कठिन परिस्थितियों में भी उन्हें आगे पढ़ाने का निश्चय किया। उन्होंने अल्मोड़ा से 1936 में हाईस्कूल और 1938 में इंटरमीडिएट उत्तीर्ण किया। इसके बाद उन्होंने Banaras Hindu University से बीएससी और एमएससी की डिग्री प्राप्त की तथा वहीं प्रोफेसर आसुंदी के निर्देशन में भौतिक विज्ञान में पीएचडी पूरी की।
उच्च शोध के लिए वे बेंगलुरु गए, जहां उन्हें सर सी. वी. रमन के साथ कार्य करने का अवसर मिला। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था। रमन के मार्गदर्शन में उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान की उच्च परंपराओं को आत्मसात किया और आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक बने।
बीसवीं सदी के पांचवें दशक में जब नैनीताल में डीएसबी कॉलेज की स्थापना हुई, तब प्रो. पंत आगरा कॉलेज से भौतिक विज्ञान विभागाध्यक्ष के रूप में वहां पहुंचे। उन्होंने सीमित संसाधनों और कबाड़ सामग्री से आधुनिक फोटो फिजिक्स लैब की स्थापना की और पहला टाइम-डोमेन स्पेक्ट्रोमीटर तैयार किया। उनके शोध छात्र डी. पी. खंडेलवाल के साथ मिलकर उन्होंने यूरेनियम लवणों की स्पेक्ट्रोस्कोपी पर महत्वपूर्ण शोध किया, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सराहना मिली। उनकी शोध उपलब्धियों का उल्लेख विश्व प्रसिद्ध पुस्तक Photochemistry of Uranyl Compounds में कई बार किया गया है।
उनकी उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए। 1960-61 में वे फुलब्राइट स्कॉलर के रूप में अमेरिका में कार्यरत रहे और नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक एम. काशा की प्रयोगशाला में शोध किया। उन्हें रमन शताब्दी स्वर्ण पदक तथा प्रोफेसर असुंडी शताब्दी पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिले। उन्होंने अपने जीवनकाल में 20 से अधिक पीएचडी छात्रों का मार्गदर्शन किया और 150 से अधिक शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित किए।
1973 से 1977 तक वे कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति रहे। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक नींव मजबूत हुई। बाद में वे शिक्षा निदेशक तथा गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर में डीन के पद पर भी रहे। उनकी प्रयोगशाला से 36 से अधिक शोधार्थियों ने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और अनेक छात्र देश-विदेश की प्रतिष्ठित संस्थाओं में कार्यरत हुए।
वैज्ञानिक होने के साथ-साथ वे उत्तराखंड राज्य आंदोलन के भी प्रमुख विचारक थे। 24–25 जुलाई 1979 को उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई और अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को राजनीतिक स्वरूप दिया। उन्होंने “पानी और जवानी” को पहाड़ के विकास का मूल मंत्र बताया।
9 मई 2001 को उनका निधन हुआ। प्रो. डी. डी. पंत का जीवन वैज्ञानिक उत्कृष्टता, शैक्षिक नेतृत्व और क्षेत्रीय विकास के प्रति समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है। वे आज भी उत्तराखंड और भारत के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।