बिपिन चंद्र त्रिपाठी

(जन्म 23 Feb 1945 – मृत्यु:30 Aug 2004 )

बिपिन चंद्र त्रिपाठी उत्तराखंड की धरती के ऐसे कर्मयोगी थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज, पर्यावरण और पहाड़ की अस्मिता के लिए समर्पित कर दिया। वे एक निर्भीक पत्रकार, जुझारू समाजवादी नेता और उत्तराखंड राज्य आंदोलन के अग्रणी योद्धा थे। वे उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और नवगठित उत्तराखंड राज्य की पहली विधानसभा (2002–2004) में द्वाराहाट से विधायक रहे।

उनका जीवन संघर्ष, त्याग और पर्यावरण संरक्षण की मिसाल है।

बिपिन त्रिपाठी का जन्म 23 फरवरी 1945 को अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट क्षेत्र के दैरी गांव में हुआ। उनके पिता मथुरा दत्त त्रिपाठी डाक विभाग में कार्यरत थे और माता का नाम कलावती देवी था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुक्तेश्वर (जिला नैनीताल) में हुई।

उन्होंने द्वाराहाट से इंटरमीडिएट पास किया और इलेक्ट्रिकल डिप्लोमा करने के लिए हल्द्वानी गए। आगे चलकर उन्होंने Kumaun University से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। युवावस्था से ही उनमें सामाजिक चेतना और नेतृत्व क्षमता दिखाई देने लगी थी।

1967 में स्नातक करने के बाद उन्होंने समाजवादी आंदोलन को अपनाया। वे समाजवादी विचारक Ram Manohar Lohia से अत्यधिक प्रभावित थे।

1965 से 1969 तक उन्होंने नैनीताल जिले के तराई क्षेत्र में भूमिहीन ग्रामीणों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। 1968-69 में उन्होंने “युवजन मशाल” नामक पाक्षिक समाचार पत्र शुरू किया। 1971 में उन्होंने “द्रोणांचल प्रहरी” का प्रकाशन आरंभ किया।

पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने लालकुआं की स्टार पेपर मिल और अन्य व्यापारिक माफियाओं द्वारा वनों की लूट के खिलाफ आवाज उठाई।

1974 में उन्होंने नैनीताल में वनों की नीलामी का विरोध किया और 18 अन्य कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तार हुए। उसी वर्ष उनके नेतृत्व में चिपको आंदोलन की एक ऐतिहासिक लड़ाई चाचरीधार जंगल को बचाने के लिए लड़ी गई। यह आंदोलन सहारनपुर पेपर मिल के खिलाफ था और अंततः जंगल को बचाने में सफलता मिली।

1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें 22 महीनों से अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा।


बिपिन चंद्र त्रिपाठी Uttarakhand Kranti Dal के संस्थापक सदस्यों में से थे। 1979 में पार्टी की स्थापना के साथ उन्होंने उत्तराखंड राज्य की मांग को संगठित रूप दिया।

वे उत्तराखंड राज्य आंदोलन के कट्टर समर्थक और अग्रिम पंक्ति के नेता थे। उनका लक्ष्य था — पहाड़ की पहचान, संसाधनों पर स्थानीय अधिकार और संतुलित विकास।

2002 में वे नवगठित उत्तराखंड राज्य की पहली विधानसभा में द्वाराहाट से विधायक चुने गए। विधायक बनने के बाद भी उन्होंने अपने संघर्ष को और अधिक जोश के साथ जारी रखा।

30 अगस्त 2004 को 59 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उस समय वे उत्तराखंड क्रांति दल की राज्य इकाई के अध्यक्ष भी थे।

उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र पुष्पेश त्रिपाठी द्वाराहाट से विधायक बने।

बिपिन चंद्र त्रिपाठी का जीवन हमें यह सिखाता है कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति की रक्षा का दायित्व है। वे आज भी उत्तराखंड के पर्यावरण आंदोलन और राज्य निर्माण संघर्ष के प्रेरणास्रोत माने जाते हैं।