दिवाकर भट्ट

(जन्म 01 Aug 1946 – मृत्यु:25 Nov 2025 )

दिवाकर भट्ट को उत्तराखंड राज्य आंदोलन का “फील्ड मार्शल” कहा जाता था। वे उन नेताओं में रहे जिन्होंने आंदोलन को सिर्फ नारेबाजी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी उसे जिंदा रखा। उनका राजनीतिक सफर यूकेडी से शुरू हुआ और लंबे समय तक वे इसी क्षेत्रीय दल के माध्यम से पृथक राज्य की मांग को जन-जन तक पहुँचाते रहे।

आईआईटी से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने हरिद्वार स्थित बीएचईएल में नौकरी की। कर्मचारी नेता के रूप में वे श्रमिक आंदोलनों में सक्रिय रहे। 1970 में उन्होंने ‘तरुण हिमालय’ संस्था की स्थापना की, जिसके माध्यम से सांस्कृतिक कार्यक्रमों (जैसे रामलीला) और एक विद्यालय की स्थापना कर शिक्षा व समाज जागरण का कार्य किया। 1971 के गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही। बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के दौरान संभावित कानून-व्यवस्था की आशंका में उन्हें साथियों सहित गिरफ्तार भी किया गया था।

1977 में वे उत्तराखंड युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने। 1978 में दिल्ली के बोट क्लब पर अलग राज्य की मांग को लेकर आयोजित रैली में वे उन युवाओं में शामिल थे जिन्होंने बद्रीनाथ से दिल्ली तक पैदल यात्रा की। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में भी रहना पड़ा। पंतनगर विश्वविद्यालय कांड के विरोध में चले आंदोलन में भी वे अग्रिम पंक्ति में रहे। 1979 में यूकेडी की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और तब से वे निरंतर राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़े रहे।

1994 के रामपुर तिराहा कांड के बाद जब आंदोलन में ठहराव आने लगा, तब दिवाकर भट्ट ने उसे नई ऊर्जा देने के लिए 1995 में श्रीयंत्र टापू और बाद में खैट पर्वत पर आमरण अनशन किया। खैट पर्वत, जो लगभग 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित दुर्गम क्षेत्र है, वहाँ 32 दिनों तक चला उनका अनशन आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर बना। प्रशासन के लिए वहाँ पहुँचना कठिन था, लेकिन अंततः उनकी मांगों पर सकारात्मक पहल शुरू होने के बाद उन्होंने अनशन तोड़ा।

राजनीतिक जीवन में भी वे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। 1982 से 1996 तक तीन बार कीर्तिनगर के ब्लॉक प्रमुख बने। 1999 में वे यूकेडी के केंद्रीय अध्यक्ष रहे। 2002 के विधानसभा चुनाव में उनके नेतृत्व में पार्टी के चार विधायक चुने गए, जो पार्टी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन माना जाता है। 2007 में देवप्रयाग से विधायक चुने जाने के बाद वे तत्कालीन B. C. Khanduri सरकार में यूकेडी कोटे से राजस्व मंत्री बने। मंत्री रहते हुए उन्होंने भू-कानून को सख्त किया और भूमि खरीद की सीमा 500 वर्गमीटर से घटाकर 250 वर्गमीटर करवाई। पहाड़ों में पटवारी व्यवस्था सुधारने की दिशा में भी उन्होंने काम किया।

बाद के वर्षों में उनके राजनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव आया। 2012 में उन्होंने Bharatiya Janata Party के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। बाद में वे भाजपा से अलग हुए, निर्दलीय चुनाव भी लड़ा और अंततः पुनः अपनी मूल पार्टी यूकेडी में लौट आए।

दिवाकर भट्ट का जीवन संघर्ष, त्याग और उत्तराखंड की अस्मिता के लिए समर्पण की मिसाल रहा। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि आंदोलन की आत्मा थे। उनका योगदान उत्तराखंड के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा।